Thursday, 2 November 2017

कुछ फायदा नहीं

मैं सोचता हूँ, खुद को समझाऊँ बैठ कर एकदिन
मगर, कुछ फायदा नहीं ||

तुम क्या हो, हकीकत हो या ख़्वाब हो
किसी दिन फुर्सत से सोचेंगे, अभी कुछ फायदा नहीं ||

कभी छिपते है कभी निकल आते है, कितने मासूम है ये मेरे आँशु
मैंने कभी पूछा नहीं किसके लिए गिर रहे हो तुम
क्योकि कुछ फायदा नहीं

तुम पूछती मुझसे तो मैं बहुत कुछ कहता
मगर वो सब तुम्हे सुनना ही कहाँ था जो मुझे कहना था
मगर रहने दे, कुछ फायदा नहीं

फिर से वही दर्द वही आहे, लाख रोके खुद को फिर भी वही जाए
बेहतर होता कि कभी मिलते ही नहीं
मगर अब जब मिले है तो ये दर्द सहने दे
कुछ फायदा नहीं

वो कहती है में उसके काबिल नहीं हूँ
बहुत है अभी जिन्हे मै हासिल नहीं हूँ
कुछ भी हो हक़ीक़त मगर पागल नहीं हूँ
मगर कुछ फायदा नहीं

किसी दिन फुर्सत से सोचेंगे , अभी कुछ फायदा नहीं ||

Wednesday, 11 October 2017

तुम्हे पढ़ना नहीं आया

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय


जिंदगी की क़िताब कुछ बिखरने सी लगी है
बेचने की ख़ातिर इसे  मुझे मढ़ना नहीं आया ||

लोग कहते है कि मुझे पत्थर गढ़ना नहीं आया
तुम्हे क्या ख़ाक लिखता तुम्हे पढ़ना नहीं आया ||

खुद से ही लड़ता रहा खुद की ही ख़ातिर में 
तुम्हारे लिए ज़माने से मुझे लड़ना नहीं आया ||

मेरे साथ और लोग थे सब आगे निकल गए
मै अब तक वही हूँ   मुझे बढ़ना नहीं आया || 

Sunday, 8 October 2017

कोई मजहब नहीं होता

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

तुम्हारे वास्ते मैंने भी बनाया था एक मंदिर
जो तुम आती तो कोई गज़ब नहीं होता ||

मन्दिर मस्ज़िद गुरद्वारे हर जगह झलकते है
बेचारे आंशुओं का कोई मजहब नहीं होता ||

तुम्हारे शहर का मिज़ाज़ कितना अज़ीज़ था
हम दोनों बहकते कुछ अजब नहीं होता ||

जिनके ज़िक्र में कभी गुजर जाते थे मौसम
उनका चर्चा भी अब हर शब नहीं होता ||

जब से समझा क्या है, अमीरी की क़ीमत
ख़ुशनसीब है वो पागल जो अब नहीं रोता ||  

Friday, 6 October 2017

कब नीर बहेगा आँखों में

सागर कब सीमित होगा
फिर से वो जीवित होगा
आग जलेगी जब उसके अंदर
प्रकाश फिर अपरिमित होगा ||
सूरज से आँख मिलाएगा
कब तक झूमेगा रातों में ?
कब नीर बहेगा आँखों में ?

छिपा कहाँ आक्रोश रहेगा
देखो कब तक खामोश रहेगा
ज्वार किसी दिन उमड़ेगा
 सीमाएं सारी तोड़ेगा
वो सच तुमको बतलायेगा
बातों से आग लगायेगा
एक धनुष बनेगा बातों का
बातों के तीर चलायेगा
कोई समझकर पुल गुजरेगा
कोई फसा रहेगा बातों में
कब नीर बहेगा आँखों में ?

Thursday, 28 September 2017

कभी सोचता हूँ कि

कभी सोचता हूँ  कि
जिंदगी की हर साँस जिसके नाम लिख दूँ
वो नाम इतना गुमनाम सा क्यों है ?

कभी सोचता हूँ  कि
हर दर्द हर शिकन में, हर ख़ुशी हर जलन में
हर वादे-ए-जिंदगी में, हर हिज्र-ए -वहन में
जोड़ दूँ जिसका नाम, इतना गुमनाम सा क्यों है ?

कभी सोचता हूँ  कि
सुबह है, खुली है अभी शायद आँखें मेरी
लगता है पर अभी से शाम क्यों है
फिर सोचता हूँ वजह, तेरा चेहरा नजर आता है
चेहरा है, पर नाम गुमनाम सा क्यों है?

कभी सोचता हूँ  कि
लोग करते है फ़रिश्तो से मिलने की फ़रियाद
तेरे तसवुर में हमें रहता नहीं कुछ भी याद
वो हाल जिसे  छिपाने की कश्मकश में हूँ 
मेरी निगाहों में सरेआम सा क्यों है ?

कभी सोचता हूँ कि.... 

Thursday, 14 September 2017

जिस रात उस गली में

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

रौशनी में खो गयी कुछ बात जिस गली में
वो चाँद ढूढ़ने गया जिस रात उस गली में ||

आज झगड़ रहे है आपस में कुछ लुटेरे
कुछ जोगी गुजरे थे एक साथ उस गली में ||

कुछ चिरागो ने जहाँ अपनी रौशनी खो दी
क्यों ढूढ़ता है पागल कयनात उस गली में ||

मौसम बदलते होंगे तुम्हारे शहर में लेकिन
रहती है आँशुओं की बरसात उस गली में ||

सूरज को भी ग्रहण लगता है हर एक साल
बदलेंगे एक दिन जरूर हालत उस गली में ||  

Wednesday, 6 September 2017

फूलो के इम्तिहान का

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

मंदिर में काटों ने अपनी जगह बना ली
वक़्त आ गया है फूलो के इम्तिहान का  ||

सावन में भीगना कहाँ जुल्फों से खेलना
बारिश में जलता घर किसी किसान का ||

हालात बदलने की कल बात करता था
लापता है पता आज उसके मकान का ||

निगाह उठी आज तो महसूस करता हूँ
लाल सा दिखने लगा रंग आसमान का ||

लुटेरों की हुक़ूमत जहाजों पर हो गयी
अंदाजा किसे है दरिया के नुकसान का ||

आइना कहाँ दुनियाँ की नजर में  "शिव"
अपने ही सबूत मांगते तेरी पहचान का ||

तबीयत बदल जाए

तबीयत से देख ले तुम्हे तो तबीयत बदल जाए, 
मेरा ईमान बदला है उनकी शरीयत बदल जाए || 
कवि: #शिवदत्त श्रोत्रिय

Wednesday, 30 August 2017

कितना कुछ बदल जाता है, आधी रात को


कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

जितना भी कुछ भुलाने का
दिन में प्रयास किया जाता है
अनायास ही सब एक-एक कर
मेरे सम्मुख चला आता है
कितना कुछ बदल जाता है, आधी रात को....

असंख्य तारे जब साथ होते है
उस आसमान की छत पर
मैं खुद को ढूढ़ने लगता हूँ तब
किसी कागज़ के ख़त पर
धीरे धीरे यादों का एक फिर
घेरा सा बनता है
कोई किरदार जी उठता
कोई किरदार मरता है
मुकम्मल नहीं होता है यादों का बसेरा
रेत सा  बिखरता है
कुछ समेटकर उससे सम्हल जाता है
कितना कुछ बदल जाता है, आधी रात को....

सन्नाटे में जब तुम्हे सुनने की
आस जगती है
तुम्हारे लम्स को सोचूँ तो फिर
प्यास लगती है
कभी असीमित आकाश में वो
थक चुका पंछी
नहीं धरती कही उसको अब
पास दिखती है
एक आँख झूमती मस्ती में दूजी
उदास लगती है ||
जब एक आँख से हिमखंड
पिघल जाता है ||
कितना कुछ बदल जाता है, आधी रात को.... 

Sunday, 20 August 2017

बहुत बेशर्म है या ज़िद्दी

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

वो लड़का जो कभी किताबों से मोहब्बत करता था
सुना है, आजकल मोहब्बत में किताबें लिख रहा हैं

पहले रास्ते की किसी सड़क के किसी मोड़ पर
या शहर के पुराने बाज़ार की किसी दुकान के काँच की दीवारों में कैद
किसी किताब को दिल दे बैठता था ||

आजकल वो अपना दिल हथेली पर रख कर घूमता है
उसी सड़क के मोड़ पर किसी दूकान या शॉपिंग मॉल के
एस्केलेटर से उतरती हुई लड़की को दिल देना चाहता है ||

किताबो के कवर की तरह ही वो चहरे पढ़ना चाहता है
और शायद वही गलती जानबूझकर दोहराना चाहता है
जो कि किताबों के कवर देखकर किताब उठाकर उसके अंदर की
कहानियो में फस कर करता था |
अब सड़क किनारें किताबों की दुकानों के प्रति उसका मोह
भंग हो चूका है
उसकी सोच का स्तर अब गिर चुका है या फिर किताबो का,
जब से उसने सड़क के फुटपाथ पर किताबो को बिकते हुए देखा है
जहाँ से वो कभी जूते खरीदा करता था ||

वो आज भी पढ़ना चाहता है, मगर केवल चहरे ...
पर शायद उसने ये हुनर सीखा नहीं है, वो पागल अभी भी
हर सीने में दिल ढ़ूढ़ने निकल पड़ता है ||
हर बार उसे पत्थर मिले है सीने में , पर पागल
ठोकरों से सम्हलता कहाँ है ?
लगता है बहुत बेशर्म है या ज़िद्दी।|