Wednesday, 14 March 2018

खुदखुशी के मोड़ पर

जिंदगी बिछड़ी हो तुम तन्हा मुझको छोड़ कर 
आज मैं बेबस खड़ा हूँ, खुदखुशी के मोड़ पर || 

जुगनुओं तुम चले आओ, चाहें जहाँ कही भी हो 
शायद कोई रास्ता बने तुम्हारी रौशनी को जोड़ कर || 


जानता हूँ कुछ नहीं मेरे अंदर जो मुझे  सुकून दे 
फिर भी जोड़ रहा हूँ  मैं खुद ही खुद को तोड़ कर || 

जिस्म को ढकने को हर रोज बदलता हूँ लिबास 
रूह पर  नंगी है कब से मेरे बदन को ओढ़ कर || 

#शिवदत्त श्रोत्रिय

Thursday, 15 February 2018

जब से तुम गयी हो

हर रात जो बिस्तर मेरा इंतेजार करता था,
जो दिन भर की थकान को ऐसे पी जाता था जैसे की मंथन के बाद विष को पी लिया भोले नाथ ने
वो तकिया जो मेरी गर्दन को सहला लेता था जैसे की ममता की गोद
वो चादर जो छिपा लेती थी मुझको बाहर की दुनिया से
आजकल ये सब नाराज़ है, पूरी रात मुझे सताते है
जब से तुम गयी हो …
रात भी परेशान है मुझसे, दिन भी उदास है
शाम तो ना जाने कितनी बेचैन करती है
वो गिटार जो हर रोज मेरा इंतेजार करता था आजकल मुझे देखता ही नही
आज चाय बनाई तो वो भी जल गयी, बहुत काली सी हो गयी
लॅपटॉप है जो कुछ पल के लिए बहला लेता है मुझे सम्हाल लेता है
पर वो भी फिर कुछ ज़्यादा साथ नही निभाता ||
सब 2 दिन मे बदल गये है मुझसे, जब से तुम गयी हो….

Saturday, 9 December 2017

खुद को तोड़ ताड़ के

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

कब तक चलेगा काम खुद को जोड़ जाड के
हर रात रख देता हूँ मैं, खुद को तोड़ ताड़ के ||

तन्हाइयों में भी वो मुझे तन्हा नहीं होने देता 
जाऊं भी तो कहाँ मैं खुद को छोड़ छाड़ के ||

हर बार जादू उस ख़त का बढ़ता जाता है
जिसको रखा है हिफ़ाजत से मोड़ माड़ के ||

वैसे  ये भी कुछ नुक़सान का सौदा तो नहीं
सँवार ले खुद को वो अगर मुझको बिगाड़ के ||

खुशबू न हो मगर किसी को ज़ख्म तो न दे
तुलसी लगा लूँ आँगन में गुलाब उखाड़ के || 

Thursday, 2 November 2017

कुछ फायदा नहीं

मैं सोचता हूँ, खुद को समझाऊँ बैठ कर एकदिन
मगर, कुछ फायदा नहीं ||

तुम क्या हो, हकीकत हो या ख़्वाब हो
किसी दिन फुर्सत से सोचेंगे, अभी कुछ फायदा नहीं ||

कभी छिपते है कभी निकल आते है, कितने मासूम है ये मेरे आँशु
मैंने कभी पूछा नहीं किसके लिए गिर रहे हो तुम
क्योकि कुछ फायदा नहीं

तुम पूछती मुझसे तो मैं बहुत कुछ कहता
मगर वो सब तुम्हे सुनना ही कहाँ था जो मुझे कहना था
मगर रहने दे, कुछ फायदा नहीं

फिर से वही दर्द वही आहे, लाख रोके खुद को फिर भी वही जाए
बेहतर होता कि कभी मिलते ही नहीं
मगर अब जब मिले है तो ये दर्द सहने दे
कुछ फायदा नहीं

वो कहती है में उसके काबिल नहीं हूँ
बहुत है अभी जिन्हे मै हासिल नहीं हूँ
कुछ भी हो हक़ीक़त मगर पागल नहीं हूँ
मगर कुछ फायदा नहीं

किसी दिन फुर्सत से सोचेंगे , अभी कुछ फायदा नहीं ||

Wednesday, 11 October 2017

तुम्हे पढ़ना नहीं आया

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय


जिंदगी की क़िताब कुछ बिखरने सी लगी है
बेचने की ख़ातिर इसे  मुझे मढ़ना नहीं आया ||

लोग कहते है कि मुझे पत्थर गढ़ना नहीं आया
तुम्हे क्या ख़ाक लिखता तुम्हे पढ़ना नहीं आया ||

खुद से ही लड़ता रहा खुद की ही ख़ातिर में 
तुम्हारे लिए ज़माने से मुझे लड़ना नहीं आया ||

मेरे साथ और लोग थे सब आगे निकल गए
मै अब तक वही हूँ   मुझे बढ़ना नहीं आया || 

Sunday, 8 October 2017

कोई मजहब नहीं होता

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

तुम्हारे वास्ते मैंने भी बनाया था एक मंदिर
जो तुम आती तो कोई गज़ब नहीं होता ||

मन्दिर मस्ज़िद गुरद्वारे हर जगह झलकते है
बेचारे आंशुओं का कोई मजहब नहीं होता ||

तुम्हारे शहर का मिज़ाज़ कितना अज़ीज़ था
हम दोनों बहकते कुछ अजब नहीं होता ||

जिनके ज़िक्र में कभी गुजर जाते थे मौसम
उनका चर्चा भी अब हर शब नहीं होता ||

जब से समझा क्या है, अमीरी की क़ीमत
ख़ुशनसीब है वो पागल जो अब नहीं रोता ||  

Friday, 6 October 2017

कब नीर बहेगा आँखों में

सागर कब सीमित होगा
फिर से वो जीवित होगा
आग जलेगी जब उसके अंदर
प्रकाश फिर अपरिमित होगा ||
सूरज से आँख मिलाएगा
कब तक झूमेगा रातों में ?
कब नीर बहेगा आँखों में ?

छिपा कहाँ आक्रोश रहेगा
देखो कब तक खामोश रहेगा
ज्वार किसी दिन उमड़ेगा
 सीमाएं सारी तोड़ेगा
वो सच तुमको बतलायेगा
बातों से आग लगायेगा
एक धनुष बनेगा बातों का
बातों के तीर चलायेगा
कोई समझकर पुल गुजरेगा
कोई फसा रहेगा बातों में
कब नीर बहेगा आँखों में ?

Thursday, 28 September 2017

कभी सोचता हूँ कि

कभी सोचता हूँ  कि
जिंदगी की हर साँस जिसके नाम लिख दूँ
वो नाम इतना गुमनाम सा क्यों है ?

कभी सोचता हूँ  कि
हर दर्द हर शिकन में, हर ख़ुशी हर जलन में
हर वादे-ए-जिंदगी में, हर हिज्र-ए -वहन में
जोड़ दूँ जिसका नाम, इतना गुमनाम सा क्यों है ?

कभी सोचता हूँ  कि
सुबह है, खुली है अभी शायद आँखें मेरी
लगता है पर अभी से शाम क्यों है
फिर सोचता हूँ वजह, तेरा चेहरा नजर आता है
चेहरा है, पर नाम गुमनाम सा क्यों है?

कभी सोचता हूँ  कि
लोग करते है फ़रिश्तो से मिलने की फ़रियाद
तेरे तसवुर में हमें रहता नहीं कुछ भी याद
वो हाल जिसे  छिपाने की कश्मकश में हूँ 
मेरी निगाहों में सरेआम सा क्यों है ?

कभी सोचता हूँ कि.... 

Thursday, 14 September 2017

जिस रात उस गली में

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

रौशनी में खो गयी कुछ बात जिस गली में
वो चाँद ढूढ़ने गया जिस रात उस गली में ||

आज झगड़ रहे है आपस में कुछ लुटेरे
कुछ जोगी गुजरे थे एक साथ उस गली में ||

कुछ चिरागो ने जहाँ अपनी रौशनी खो दी
क्यों ढूढ़ता है पागल कयनात उस गली में ||

मौसम बदलते होंगे तुम्हारे शहर में लेकिन
रहती है आँशुओं की बरसात उस गली में ||

सूरज को भी ग्रहण लगता है हर एक साल
बदलेंगे एक दिन जरूर हालत उस गली में ||  

Wednesday, 6 September 2017

फूलो के इम्तिहान का

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

मंदिर में काटों ने अपनी जगह बना ली
वक़्त आ गया है फूलो के इम्तिहान का  ||

सावन में भीगना कहाँ जुल्फों से खेलना
बारिश में जलता घर किसी किसान का ||

हालात बदलने की कल बात करता था
लापता है पता आज उसके मकान का ||

निगाह उठी आज तो महसूस करता हूँ
लाल सा दिखने लगा रंग आसमान का ||

लुटेरों की हुक़ूमत जहाजों पर हो गयी
अंदाजा किसे है दरिया के नुकसान का ||

आइना कहाँ दुनियाँ की नजर में  "शिव"
अपने ही सबूत मांगते तेरी पहचान का ||